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रिश्तों की खामोशी

Rajesh Meena

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुछ रिश्ते
        
                                                    
                            
बिना बोले टूट जाते हैं।
न कोई लड़ाई,न शिकवा,
न ही कोई अल्फ़ाज़।

बस धीरे-धीरे, चुप्पियों की दीवार
ऊँची होती जाती है।

एक वक़्त था, जब हर बात में
एक "हम" था।
अब, हर सोच में , सिर्फ़ "मैं" रह गया है।

आख़िरी मुलाक़ात में
न कोई ग़लती ढूंढी गई,
न कोई माफ़ी माँगी गई।
सब कुछ बस थक कर चुप हो गया।

रिश्ते हमेशा शोर से नहीं टूटते,
कई बार खामोशी सबसे बड़ी दरार होती है।
-राजेश मीणा आजाद 
एक वर्ष पहले
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