रंग समेटे झोली में, ले के फूलों के हार
आ पहुंचा है द्वार तुम्हारे, होली का त्यौहार
उपवन सजे हुए फूलों से, ऐसे आयी बहार
जैसे कोई नयी नवेली दुल्हन करे श्रृंगार
रूप रंग पे प्रकृति के, यूँ आया नया निखार
ओढ़ी चूनर धानी, दिया पतझड़ वसन उतार
नव पल्लवित शाखाएँ, जैसे करती प्रकट आभार
झुकी हुयी हैं नीचे, लेकर पुष्प गुच्छ उपहार
हुलस रहा धरती का कण कण, जान मानस में हर्ष अपार
पुष्प क्यारियों में गुंजन करते, मधुकर करें विहार
फागुन की अगवानी को, आतुर है सब संसार
मीठी गुजिया करती मानो मीठी सी मनुहार
हुयी सुगन्धित हवा अबीरी, मस्तक पर मले गुलाल
तृश्णित मन की प्यास बुझाती, रंगों की बौछार
होली के संग जल जाते , मानव मन के सभी विकार
परिकल्पनाएं सदभाव की, हो उठती हैं साकार
भाईचारे का पाठ पढ़ाता, सिखाता परस्पर प्यार
प्रेम भाव की अलख जगाता, होली का त्यौहार
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