नाम कहीं नहीं
न घर के दरवाज़े पर नाम था,
न घर के कागज़ात पर नाम था,
मगर घर के अंदर
हर काम पर बहू का नाम था।
सुबह की पहली चाय से,
रात के आख़िरी निवाले तक,
हर ज़िम्मेदारी में उसका हिस्सा था,
हर फ़र्ज़ में उसका नाम था।
घर की दीवारें उसकी मेहनत से सजीं,
आँगन उसकी हथेलियों से महका,
रिश्तों को उसने सींचा उम्र भर,
फिर भी अधिकार में उसका नाम कहाँ था?
घर चलाने वाली को
घर की मालकिन नहीं कहा गया,
जिसने अपना सब कुछ दे दिया,
उसे अपना कुछ भी नहीं दिया गया।
अजीब दस्तूर है इस दुनिया का—
मेहनत में बहू,
मगर कागज़ में कोई और,
घर में उसका हर निशान था,
बस नाम कहीं नहीं था।
— रजनी