आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नाम कहीं नहीं

                
                                                         
                            नाम कहीं नहीं
                                                                 
                            

न घर के दरवाज़े पर नाम था,
न घर के कागज़ात पर नाम था,
मगर घर के अंदर
हर काम पर बहू का नाम था।

सुबह की पहली चाय से,
रात के आख़िरी निवाले तक,
हर ज़िम्मेदारी में उसका हिस्सा था,
हर फ़र्ज़ में उसका नाम था।

घर की दीवारें उसकी मेहनत से सजीं,
आँगन उसकी हथेलियों से महका,
रिश्तों को उसने सींचा उम्र भर,
फिर भी अधिकार में उसका नाम कहाँ था?

घर चलाने वाली को
घर की मालकिन नहीं कहा गया,
जिसने अपना सब कुछ दे दिया,
उसे अपना कुछ भी नहीं दिया गया।

अजीब दस्तूर है इस दुनिया का—
मेहनत में बहू,
मगर कागज़ में कोई और,
घर में उसका हर निशान था,
बस नाम कहीं नहीं था।

— रजनी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर