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क्या मिला चरित्र बचाकर

Rajani Shakyawar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            क्या मिला चरित्र बचाकर
        
                                                    
                            

मन ही मन से कहा करती थी
एक लड़की अपनी जवानी में—
चल, बहककर घूमें-फिरें,
दुनिया देखें, थोड़ा जी लें,
मगर फिर खुद को रोक लेती थी,
कहती थी—
नहीं, यह समय घूमने का नहीं,
यह समय अपनी ज़िंदगी और भविष्य बनाने का है।

दूसरी लड़कियों को देखकर
मन तो उसका भी करता था,
उनका कोई दोस्त है
तो मेरा भी होना चाहिए,
मगर फिर दिल को समझा लेती—
नहीं, ये सब फालतू काम हैं,
यह समय दोबारा नहीं आएगा,
पढ़ ले… अपना भविष्य बना।

और वह पढ़ने लगती थी,
बस एक विश्वास के साथ—
कि जीवन में जो भी पुरुष आएगा,
वही उसका पति होगा,
वही उसका अपना होगा।

मगर आज पीछे मुड़कर देखती है
तो खुद से पूछती है—
क्या मिला तुझे इतनी कुर्बानियाँ देकर?

किसने तारीफ़ की
कि तूने अपना चरित्र बचाकर रखा?
किसने कहा—
तूने अपनी जवानी
सही जगह लगाई?

उल्टा दोष सारे
तेरे हिस्से में डाल दिए गए,
जिन गुनाहों को तूने किया ही नहीं,
उनमें भी तेरा नाम जोड़ दिया गया।

अब ले…
आज अपने चरित्र पर गर्व कर,
जिस उम्र में खेलना-कूदना था,
तब तूने खुद को रोक लिया था।

जिस उम्र में
ज़िंदगी को खुलकर जीना था,
तब तू भविष्य सँवारती रही।

और आज?
ईमानदार होकर भी दोषी,
चरित्रवान होकर भी बदनाम।

शायद दर्द इसलिए भी ज्यादा है
कि मैंने किया कुछ भी नहीं,
फिर भी गुनाह सारे मेरे हिस्से आए।

और कभी-कभी मन पूछता है—
जिसने जीवन में
तेरह रिश्ते बनाए,
वह भी आज किसी की दुलारी है,
और जिसने खुद को
सिर्फ एक रिश्ते के लिए बचाकर रखा,
उसके हिस्से में
सफाई देने के सिवा क्या आया?

तब मन चुप हो जाता है…
और बस इतना कहता है—

शायद गलती चरित्रवान होने की नहीं थी,
गलती यह थी कि मैंने सोचा था
दुनिया भी चरित्र की कीमत समझती है।
-रजनी
3 घंटे पहले
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