जो समझ लो, वही हूँ मैं
शौक नहीं रहा अब
खुद को साबित करने का,
जिसे जो समझना है,
समझ ले मुझे उसी तरह।
हाथ जोड़कर भी देख लिया,
गिड़गिड़ाकर भी देख लिया,
प्यार से कहकर देख लिया,
रोकर भी और लड़कर देख लिया,
पैरों में भी गिरी,
फिर भी कोई मुझे समझने वाला न मिला।
हर बार लगा
शायद इस बार कोई समझेगा,
शायद इस बार मेरी खामोशी पढ़ेगा,
मगर हर बार
मैं ही गलत समझी गई।
अब किस-किस को सफाई दूँ,
किस-किस को अपना दर्द सुनाऊँ?
जिसे समझना था,
वह मेरी आँखों में भी नहीं समझ पाया,
तो शब्दों से क्या समझेगा?
अब शौक नहीं रहा
खुद को साबित करने का,
न किसी के सामने
अपने सच की गवाही देने का।
मैं जैसी हूँ, वैसी ही हूँ,
न सफाई दूँगी, न शिकायत करूँगी,
तुम्हारी नज़र में जैसी हूँ,
अब तो वही सही।
जो समझ लो, वही हूँ मैं,
अब खुद को साबित करने की
कोई चाह नहीं—
बहुत कोशिश कर चुकी हूँ,
अब बस अपने होने की
गवाही खुद हूँ मैं।
-रजनी