विज्ञापन

इंसान के भीतर का लोहा

Rajani Shakyawar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इंसान के भीतर का लोहा
        
                                                    
                            
मैंने उसको जब-जब देखा,
लोहा ही पाया,
लोहे जैसा तपते देखा,
तो कभी गलते पाया।
दर्द की भट्ठी में जलते देखा,
वक़्त के साँचे में ढलते देखा,
कभी हथौड़ों की चोट सही,
तो कभी ख़ुद को पिघलते देखा।
कभी चट्टान-सा अडिग खड़ा,
कभी मोम-सा पिघलते देखा,
कभी गोलियों-सा तेज़ चला,
तो कभी ख़ामोशी में चलते देखा।
हर रूप में एक कहानी थी,
हर चोट में एक निशानी थी,
मैंने उसको जब-जब देखा,
ज़िंदगी की सच्ची रवानी थी।
-रजनी
14 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Anita Dasani

15 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

12768 कविताएं

View Profile

Shivendra Mishra

4 कविताएं

View Profile