इंसान के भीतर का लोहा
मैंने उसको जब-जब देखा,
लोहा ही पाया,
लोहे जैसा तपते देखा,
तो कभी गलते पाया।
दर्द की भट्ठी में जलते देखा,
वक़्त के साँचे में ढलते देखा,
कभी हथौड़ों की चोट सही,
तो कभी ख़ुद को पिघलते देखा।
कभी चट्टान-सा अडिग खड़ा,
कभी मोम-सा पिघलते देखा,
कभी गोलियों-सा तेज़ चला,
तो कभी ख़ामोशी में चलते देखा।
हर रूप में एक कहानी थी,
हर चोट में एक निशानी थी,
मैंने उसको जब-जब देखा,
ज़िंदगी की सच्ची रवानी थी।
-रजनी
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