ग़म क्यों खरीद लाए हम
अब तलक ये समझ न पाए हम,
तेरा ग़म क्यों खरीद लाए हम।
सोचा था अपना ग़म दूर होगा,
तेरे ग़म को अपना बनाकर,
पर मालूम न था—
किसी और के ग़म में झुककर
होते नहीं कम,
बल्कि बढ़ जाते हैं अपने ही ग़म।
तुझे संभालने निकले थे हम,
और खुद को ही कहीं खो आए हम,
अब तलक ये समझ न पाए हम,
तेरा ग़म क्यों खरीद लाए हम।
-रजनी