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गलती किसी की, सज़ा किसी और को

Rajani Shakyawar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गलती किसी की, सज़ा किसी और को
        
                                                    
                            

गलती किसी और की होती है,
और सज़ा किसी और को मिलती है,
कितना अजीब इंसाफ़ है दुनिया का,
जहाँ बेगुनाहों की ज़िंदगी
दूसरों की गलतियों से हिलती है।

बेटों के पैदा होते ही
कुछ माँ-बाप का सीना गर्व से तन जाता है,
बेटा होने का घमंड
उनकी आँखों पर ऐसा चढ़ जाता है,
कि उसे दुनिया में लाने को ही
अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि समझ लेते हैं,
मगर उसे इंसान बनाने की ज़िम्मेदारी
कहीं पीछे छोड़ देते हैं।

न सिखाते हैं व्यवहार की मर्यादा,
न समझाते हैं रिश्तों का सम्मान,
न बताते हैं कि औरत कोई वस्तु नहीं,
वह भी रखती है अपना स्वाभिमान।
बेटा है, तो सब माफ़ है—
यही सोच उसे बिगाड़ देती है,
और उसकी हर बदतमीज़ी पर
परवरिश की कमी पर्दा डाल देती है।

वहीं बेटी को पालने में
माँ-बाप अपनी पूरी उम्र लगा देते हैं,
उसके संस्कारों की ख़ातिर
अपनी नींदें तक गँवा देते हैं।
उसे सही-गलत का भेद सिखाते हैं,
हर रिश्ते की मर्यादा समझाते हैं,
अपने घर की इज़्ज़त के साथ-साथ
दूसरों के घर का मान रखना भी सिखाते हैं।

उसे इतना सँवारते हैं
कि किसी की बहू बने तो घर जोड़ सके,
किसी की पत्नी बने तो रिश्ता निभा सके,
हर परिस्थिति में धैर्य रखे,
हर रिश्ते को सम्मान दे सके।

लेकिन फिर भी,
जब किसी बिगड़े हुए लड़के की मूर्खता
किसी अच्छी लड़की की ज़िंदगी उजाड़ती है,
तो सवाल उस लड़के की परवरिश पर नहीं,
उस लड़की के संस्कारों पर उठता है।
उसके माँ-बाप की परवरिश पर उँगली उठती है,
जिसने तो अपनी बेटी को
हर कदम पर सही राह दिखाई थी।

करे कोई, भरे कोई—
यही तो इस समाज की विडंबना है,
बिगाड़ता कोई और है,
और भुगतता कोई और है।

जिस बेटी को उसके माँ-बाप ने
संस्कारों की दौलत देकर विदा किया,
उसी को किसी और की लापरवाही ने
उम्र भर का दर्द दे दिया।
जिस गलती की ज़िम्मेदारी
किसी और के कंधों पर होनी चाहिए,
उसका बोझ भी अक्सर
लड़की और उसके परिवार को उठाना पड़ता है।

आख़िर कब समझेंगे वे माँ-बाप,
कि बेटा होना कोई अभिमान नहीं,
उसे अच्छा इंसान बनाना कर्तव्य है।
बेटे को जन्म देना प्रकृति का काम है,
उसे संस्कारी बनाना परवरिश का धर्म है।

बेटी को संस्कार सिखाना जितना ज़रूरी है,
बेटे को भी उतना ही सिखाना होगा,
औरत का सम्मान करना,
अपनी गलती स्वीकारना,
अपने व्यवहार की ज़िम्मेदारी लेना
और किसी की बेटी को दुख देने से पहले
अपने घर की बेटी को याद करना होगा।

क्योंकि अच्छे संस्कार
सिर्फ़ बेटियों के लिए नहीं होते,
और इज़्ज़त की हक़दार
सिर्फ़ किसी की बेटी नहीं होती।

याद रखना,
बेटे के सिर पर ताज सजाने से पहले
उसके भीतर इंसानियत जगाना,
क्योंकि अपनी औलाद की गलतियों पर
पर्दा डालना परवरिश नहीं है,
और किसी दूसरे की बेटी को
उन गलतियों की सज़ा दिलाना
किसी भी तरह का इंसाफ़ नहीं है।
— रजनी
एक घंटा पहले
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