विज्ञापन

हो सके तो दे दो उन्हें कुछ ओढ़नी के लिये

Rais Ahmad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ऐसे चिराग़ बुझा दो जिनसे बस्तियां जलें
        
                                                    
                            
हैं जुगनू ही काफ़ी सुकूँ की रौशनी के लिये
चुपके से कोई मेरा आशियाना जला गया
उसने ख़ूब रस्म निभाई है दुश्मनी के लिये
शाम ढ़लने लगी है अब चाँद को जगा दो
वो आयेगा ज़रूर फ़लक पे रौशनी के लिये
फूल ऐसे खिले हैं के अब भौंरे भी नहीं आते
चमन में अब किसे आवाज़ दें रागिनी के लिये
कम लिबास वाले क्यूँ जिस्म दिखाते हैं रईस
हो सके तो दे दो उन्हें कुछ ओढ़नी के लिये
एक घंटा पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Rabindra Aman

122 कविताएं

View Profile