ऐसे चिराग़ बुझा दो जिनसे बस्तियां जलें
हैं जुगनू ही काफ़ी सुकूँ की रौशनी के लिये
चुपके से कोई मेरा आशियाना जला गया
उसने ख़ूब रस्म निभाई है दुश्मनी के लिये
शाम ढ़लने लगी है अब चाँद को जगा दो
वो आयेगा ज़रूर फ़लक पे रौशनी के लिये
फूल ऐसे खिले हैं के अब भौंरे भी नहीं आते
चमन में अब किसे आवाज़ दें रागिनी के लिये
कम लिबास वाले क्यूँ जिस्म दिखाते हैं रईस
हो सके तो दे दो उन्हें कुछ ओढ़नी के लिये
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X