मैं चाहूंगा उसे इस कदर, कि वो मुझे मरने नहीं देगा
मगर अपनी आंखों के, समंदर में उतरने नहीं देगा।
आज मोहब्बत इस कदर, टूट के धसेगी इस दिल में
अगर चाहूँ भी तो वो ताउम्र, ये ज़ख्म भरने नहीं देगा।
काश वो दर्द बांटने के वादे, कभी हमने किये ना होते
वक़्त थाम के बैठा है वो, एक पल भी गुज़रने नहीं देगा।
मेरे अंदर का बंजर दरख़्त, एक एक बून्द को प्यासा है
आंसू कोरीयों में अटके रहेंगे, पर वो बिखरने नही देगा।
साथ चलने का इरादा था, तभी घर से निकल आया हूँ
कालिख पुती है चेहरे पे, अब वो मुझे संवरने नहीं देगा।
उम्मीद का सूरज भी आज, यही जल के ख़ाक होगा
मेरी मोहब्बत की रानाइयों, को वो निखरने नहीं देगा।
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