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कर्म का यथार्थ और मुक्ति

Radheshyam Khatik

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नफ़रत के इस जहान में।
        
                                                    
                            
जी रहे एक अरसे से,
बंदी बनके इस जहन्नुम में!

छल-कपट के रोग से,
अछूता नहीं है कोई यहाँ।
अहंकार के घोल से,
मरहम भी महफ़ूज़ कहाँ?

खो दिए सारे अवसर,
कैदखाने से निकलने के।
संगति का ये हुआ असर,
अधीन हो गए बुरे कर्मों के!

एक दिन वो भी आएगा,
हो जाएगा तन तेरा जर्जर।
जो किया है तूने पापाचार,
याद आएगा वो सब मंजर!

फरियाद करोगे रब से तब,
बंधन काटने की युक्ति का।
अब एक मिले मौका फिर,
आवागमन से मुक्ति का!

 
3 घंटे पहले
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