नफ़रत के इस जहान में।
जी रहे एक अरसे से,
बंदी बनके इस जहन्नुम में!
छल-कपट के रोग से,
अछूता नहीं है कोई यहाँ।
अहंकार के घोल से,
मरहम भी महफ़ूज़ कहाँ?
खो दिए सारे अवसर,
कैदखाने से निकलने के।
संगति का ये हुआ असर,
अधीन हो गए बुरे कर्मों के!
एक दिन वो भी आएगा,
हो जाएगा तन तेरा जर्जर।
जो किया है तूने पापाचार,
याद आएगा वो सब मंजर!
फरियाद करोगे रब से तब,
बंधन काटने की युक्ति का।
अब एक मिले मौका फिर,
आवागमन से मुक्ति का!
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