भटक रहे हैं इधर-उधर,
रिश्ते-नाते सब बंटे हुए;
ग़ैर को बनाया हमराही,
अपनों से दूर हम हुए।
हंसते-खेलते आँगन को,
उजाड़ दिया बिना जुर्म के;
धर्म नहीं यह मानवता का,
रोकर बोली माँ दर्द को पी के।
सपनों की दुनिया में हम,
झूठी शोहरत से घिरे हुए;
ग़मज़दा हैं आज इस कदर,
अपनों की प्रीत को तरस गए।
डर हुआ जब बे-इंतहा,
याद आया माँ का आँचल;
भूल कर सब मेरी ख़ता,
बाहों में भरा, नेत्र सजल।
- राधेश्याम खटीक