तुम्हें सौगंध है अश्रु न बहाना,
देख लो जिस दिन मृत्यु शय्या पर लेटे हुए।
हृदय की बात न और कहूँ, तुम्हारे हर प्रश्न पर मौन रहूँ,
मुख में न जाए जब कोई निवाला, इस देह पर पड़ी हो पुष्पमाला,
समस्त स्मृतियाँ छोड़कर, यह मोहपाश तोड़कर,
अंतिम विदाई ,इस जग से लेते हुए,
तुम्हें सौगंध है अश्रु न बहाना...
अपनी राह पर लग्न, मैं चिर निद्रा में मग्न,
कोई स्वर न मेरे कानों तक आए,
मुझसे दूर संसार की समस्त चिंताएँ,
नीर नेत्रों में भरकर, मेरा सिर गोद में रखकर,
संगी-साथी सब मुझको घेरे हुए,
तुम्हें सौगंध है अश्रु न बहाना...
तोड़ प्रीत का हर बंधन, बिना किए आलिंगन,
चार कंधों पर सवार, सुन न सकूँ तुम्हारी पुकार,
इस अंतिम मिलन से जी भर लेना, यह हृदय पाषाण कर लेना,
जब देखो ,तुम्हें सर्वस्व कहने वाले को, दिए की लौ से डरने वाले को,
अपना हर अंग अग्नि को सौंपते हुए,
तुम्हें सौगंध है अश्रु न बहाना.......
बीत गई मधुर रात्रि, अपने गंतव्य को चला यात्री,
हर दायित्व से अब मैं निवृत्त, मुझको कर देना तुम विस्मृत,
पंचतत्त्व में गई यह काया समा, मेरी समस्त भूलों को करना क्षमा,
नेत्रों में भरकर दुःख, नभ की ओर किए मुख,
अंतिम पुकार सब मुझको देते हुए,
तुम्हें सौगंध है अश्रु न बहाना...देख लो जिस दिन मृत्यु शय्या पर लेटे हुए।
--- राधा चौहान