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आदमी का चक्कर

Rabindra Aman

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यहां आदमी का कैसा है चक्कर
        
                                                    
                            
अगर किसी को कुछ मिल जाए तो,
कुछ उसकी कद्र नहीं
अगर नहीं मिले तो,वो अच्छा है,
वो है बेहतर

यहां पानी तो सबके है पास
पर इस पानी से किसी की जाती नही है प्यास

इस धरती पर यह कैसी है विडंबना
यहां किसी की चाहत का अंत नहीं,
जाने किसी मिट्टी से यह मानव बना

सबके पास तो है अपनी घरवाली
पर किसी के लिए यह दिल रहता है खाली खाली

कोई मजबूर लाचार किसी का प्यार पाकर हो गया अमीर
कोई राजा किसी की चाह में बन गया फकीर

उसी विषय पर इस दुनिया का हर लेख, हर कविता
हर गीत लिखे गए
पर इसका निकला ना कोई हल
सबके दिल को काला किया,एक गोरी का काजल

कुछ नही सब भ्रम है, सब है धुंआ
पर इस भ्रम में ही है इस जीने का मजा

कोई गरीब सुख चैन की नींद सोता है
कोई अमीर अपनी किस्मत पर रोता है

कोई अगर किसी को कुछ सुंदर दिखे तो
वो आदमी भोला भाला है
यह सुंदर लगने वाली बात, यह लुभाने वाली बात
उसने अपने अंदर पाला है

अच्छा है यह भ्रम, अगर यह भ्रम नही होता तो,
कोई अपना दुख - दर्द नहीं भुलाता
जीने की तो बात छोड़ो,
आदमी चैन से भी नहीं मर पाता
-रविन्द्र अमन
 
4 घंटे पहले
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