शीर्षक- कभी- कभी सोचती हूँ
कभी- कभी सोचती हूँ, क्रूरता आई कहाँ से होगी,
कोमल से ह्रदय पर मनुष्य ने, इसे बिठाई कहाँ से होगी?
आखिर क्यों पल भर के क्रोध में मनुष्य क्रूरता अपना लेता है,
दूजों का अहित करके स्वयं की अमूल्य ज़िंदगी भी गँवा देता है।
मनुष्य एकमात्र प्राणी है धरा पर जिसे सोचने, समझने की शक्ति मिली है,
तो आखिर क्यों वो अपने क्रोध पर ही काबू नहीं रख पाता।
क्यों ये क्रूरता इतनी बढ़ चुकी है,
हर गाँव, शहर, कस्बे में अपना घर बना चुकी है।
क्या कभी मनुष्य इस क्रूरता को भूल मनुष्य बन पाएगा?
क्या मनुष्यता के क्षेत्र में कभी नया सबेरा आएगा?
वो सुबह कब होगी, जब क्रूरता समाप्त हो चुकी होगी,
अच्छाई, इंसानियत और अपनत्व से दुनिया मुस्कुरा रही होगी।
-रिया दुबे