विज्ञापन

मजबूर जिंदगी

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सिमट के तन्हाइयों में नाकामियां अपनी बढ़ा रहा हूं अब ना रहे किसी काम के सोच कर मैं बेचैनियांं बढ़ा रहा हूं
        
                                                    
                            
इक तुम हो जो बढ़ा के फासला मुझसे शायद आज खुश भी हो बहुत जान के नादानियां खामोशियां बढ़ा रहा हूं
ऐ जिंदगी दर्द तो सिर्फ ये मिजाज़ तेरा समझ ना पाया मैं करके गुजारा किसी तरह अपनी बरबादियां बढ़ा रहा हूं
ये ना होगा कभी निभाना रस्म ए उल्फत शिद्दत से होकर मायूस अपनी वफाओं से मैं अब गुस्ताखियां बढ़ा रहा हूं
हूं हैरान परख कर अंदाज़ ए बेरुखी आपका जिंदगी मेरी बर्बाद करने वाले होकर मायूस मैं मजबूरियां बढ़ा रहा हूं
6 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7409 कविताएं

View Profile