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मजबूर जिंदगी

                
                                                         
                            सिमट के तन्हाइयों में नाकामियां अपनी बढ़ा रहा हूं अब ना रहे किसी काम के सोच कर मैं बेचैनियांं बढ़ा रहा हूं
                                                                 
                            
इक तुम हो जो बढ़ा के फासला मुझसे शायद आज खुश भी हो बहुत जान के नादानियां खामोशियां बढ़ा रहा हूं
ऐ जिंदगी दर्द तो सिर्फ ये मिजाज़ तेरा समझ ना पाया मैं करके गुजारा किसी तरह अपनी बरबादियां बढ़ा रहा हूं
ये ना होगा कभी निभाना रस्म ए उल्फत शिद्दत से होकर मायूस अपनी वफाओं से मैं अब गुस्ताखियां बढ़ा रहा हूं
हूं हैरान परख कर अंदाज़ ए बेरुखी आपका जिंदगी मेरी बर्बाद करने वाले होकर मायूस मैं मजबूरियां बढ़ा रहा हूं
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2 घंटे पहले

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