हक वफा का जता सकते हैं मगर बेवफा तुम्हें तो कह सकते नहीं बाद मुद्दत तुम मिले हो कुछ कह सकते नहीं
मजबूरी से बढ़ कर कोई सजा नहीं सकूं चार पल हमें मिला कभी नही सितम ये कि गिला हम कर सकते नहीं
ये ना सोचा लेकर जाऊं कहां फरियाद अपनी लाचारी की कोई दवा नहीं दर्द तुमसे भी हम कह सकते नहीं
बुझा दो अब इस चिराग ए मोहब्बत को बहुत सितम किया तूने मुझ पर होकर मजबूर कुछ कह सकते नहीं
मिला के खाक में खुशियां मेरी हुई नाकाम मुझको दुश्मन समझने वाले सह कर जुल्म तेरा कह सकते नहीं