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राह ए तलब पांव तेरे डगमगाए

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तेरे दर से बार बार गुजरने को जी चाहता है मिल के तुमसे हर बार हाल ए गम अपना सुनाने को जी चाहता है
        
                                                    
                            
सिवा तेरे मेरा कोई नहीं इस दुनिया में बात दिल की सुना कर बार बार अब करीब तेरे आने को जी चाहता हैं
मिले आज बाद मुद्दत हमसे कहो तो आजमा लें तुझे दिल में जला कर दिया हमें अर्ज करने को जी चाहता है
तुम ना समझ सके हो मोहब्बत मेरी अभी भी देकर दर्द हजार आजमा लो जख्म और खाने को जी चाहता है
राह ए तलब पांव तेरे डगमगाए क्यूं आजमाया नहीं हमें तुमने करूं अब मैं क्या दिल तोड़ने को जी चाहता है
34 मिनट पहले
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