ये किसने कहा बदल कर मिजाज़ आप फासला मुझसे बढ़ाइए जान कर अंदाज़ आपका चुप होना पड़ा हमें
हुआ कब आसान जीना शरीफों का जी कर किसी तरह गर्दिश ए हालात में होकर मायूस सब्र करना पड़ा हमें
या खुदा मत हो तुम बेरहम इस कदर मुझ पे खाकर ठोकरें बार बार बढ़ाए दर्द कितना ये भी सोचना पड़ा हमें
बिछड़ कर तुमसे ये ना पूछो दिया आस का बुझाए कितनी बार खोकर यादों के मंजर में दिल तोड़ना पड़ा हमें
गर रहम मुझ पर आप कुछ कर सकते नहीं तो क्या करूं बढ़ा कर बेकरारी दिल में मिजाज़ बदलना पड़ा हमें