आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

गर रहम मुझ पर आप कुछ कर सकते नहीं तो

                
                                                         
                            ये किसने कहा बदल कर मिजाज़ आप फासला मुझसे बढ़ाइए जान कर अंदाज़ आपका चुप होना पड़ा हमें
                                                                 
                            
हुआ कब आसान जीना शरीफों का जी कर किसी तरह गर्दिश ए हालात में होकर मायूस सब्र करना पड़ा हमें
या खुदा मत हो तुम बेरहम इस कदर मुझ पे खाकर ठोकरें बार बार बढ़ाए दर्द कितना ये भी सोचना पड़ा हमें
बिछड़ कर तुमसे ये ना पूछो दिया आस का बुझाए कितनी बार खोकर यादों के मंजर में दिल तोड़ना पड़ा हमें
गर रहम मुझ पर आप कुछ कर सकते नहीं तो क्या करूं बढ़ा कर बेकरारी दिल में मिजाज़ बदलना पड़ा हमें
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
27 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर