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फसाना ए अंदाज़ ए बेरुखी

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रही है जिंदगी मेरी कभी आसान कब जो सुलह मौत से करना पड़ा होकर मायूस बदनसीबी समझना पड़ा
        
                                                    
                            
सच ये दुनिया बदनसीबों की होती बहुत अजीब खाकर ठोकरें बार बार मिजाज़ भी आपका समझना पड़ा
किसने कहा होकर सामने कुछ कह ना पाऊंगा मिटा के अरमां सारे हमें अब मिजाज़ आपका समझना पड़ा
करके गुफ्तगू ख्वाब में आपसे गुज़ार दी कई रातें मैने बढ़ा कर मायूसी गर्दिश ए हालात अपनी समझना पड़ा
मिले तुम कब मुझसे जिंदादिली से याद नहीं करके याद गुज़रा ज़माना तेरा हमें अंदाज़ आपका समझना पड़ा

 
6 घंटे पहले
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