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फसाना ए अंदाज़ ए बेरुखी

                
                                                         
                            रही है जिंदगी मेरी कभी आसान कब जो सुलह मौत से करना पड़ा होकर मायूस बदनसीबी समझना पड़ा
                                                                 
                            
सच ये दुनिया बदनसीबों की होती बहुत अजीब खाकर ठोकरें बार बार मिजाज़ भी आपका समझना पड़ा
किसने कहा होकर सामने कुछ कह ना पाऊंगा मिटा के अरमां सारे हमें अब मिजाज़ आपका समझना पड़ा
करके गुफ्तगू ख्वाब में आपसे गुज़ार दी कई रातें मैने बढ़ा कर मायूसी गर्दिश ए हालात अपनी समझना पड़ा
मिले तुम कब मुझसे जिंदादिली से याद नहीं करके याद गुज़रा ज़माना तेरा हमें अंदाज़ आपका समझना पड़ा

 
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एक घंटा पहले

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