विज्ञापन

दर्द ए बेचैन ख्वाहिशें

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हुए हम मरहूम जब से किस्मत को कोसने लगे जो दर्द दिया तूने सह कर दूर तुमसे होने लगे
        
                                                    
                            
राह ए तलब चल के कांटों पे मिलना तुमसे आसान नहीं अब होकर मजबूर अरमां खोने लगे
सितम ये कि बिछड़ने का शौक हम भूलने लगे और बढ़ा के फासला मुझसे तुम दूर होने लगे
मैं तरस गया तुम्हें देखने वास्ते और तुम भी अपनी आदत के मुताबिक जख्म और देने लगे
मिटा कर यादें तेरी मैं ही न पा सकूंगा चैन कभी और तुम भी कुछ सोच के दर्द और देने लगे
3 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Pandit Chandradutt

2967 कविताएं

View Profile

PRAVEEN KUMAR

6 कविताएं

View Profile