विज्ञापन

बंदिशें ख्वाहिशों को

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आकर तू दर से लौट गया क्यूं सोच कर अंजाम ए वफा कांटों पे संभल संभल के बढ़ा कर मायूसी चलना पड़ा हमें
        
                                                    
                            
देकर दुहाई वफाओं की खुश ना कर सका तुम्हें हम ही ना रहे किसी काम के राह ए तलब ये सच सोचना पड़ा हमें
देख कर बर्बादी मेरी किया है तुने कब जीना आसान मेरा देकर दुहाई वफाओं की इरादा अब तेरा समझना पड़ा हमें
अपनी मुफलिसी में दुआ करने से फायदा क्या ख्वाब पतझड़ में देखना हुआ कामयाब कब ये सच सोचना पड़ा हमें
है गिला तेरा मुझसे बहुत ये भी जानता हूं फिर भी सोच के दर्द ए हालात बुझा कर चिराग ए दिल सिमटना पड़ा हमें
3 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

12683 कविताएं

View Profile