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बंदिशें ख्वाहिशों को

                
                                                         
                            आकर तू दर से लौट गया क्यूं सोच कर अंजाम ए वफा कांटों पे संभल संभल के बढ़ा कर मायूसी चलना पड़ा हमें
                                                                 
                            
देकर दुहाई वफाओं की खुश ना कर सका तुम्हें हम ही ना रहे किसी काम के राह ए तलब ये सच सोचना पड़ा हमें
देख कर बर्बादी मेरी किया है तुने कब जीना आसान मेरा देकर दुहाई वफाओं की इरादा अब तेरा समझना पड़ा हमें
अपनी मुफलिसी में दुआ करने से फायदा क्या ख्वाब पतझड़ में देखना हुआ कामयाब कब ये सच सोचना पड़ा हमें
है गिला तेरा मुझसे बहुत ये भी जानता हूं फिर भी सोच के दर्द ए हालात बुझा कर चिराग ए दिल सिमटना पड़ा हमें
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एक घंटा पहले

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