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परदेश

prem bajaj

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हुआ बेटा पैदा तो गांव भर में खुशियां मनाई गई,
        
                                                    
                            
चश्मों-चिराग आया खानदान का खूब बधाईयां गाई गई,

ना जाने कितने बड़े-बड़े सपने देख डाले थे,
ना पढ़ पाया खुद तो क्या बेटे को खूब पढ़ाऊंगा,
दुनियां करें सलाम ऐसा बड़ा अफसर बनाऊंगा।

पढ़-लिखकर बेटा ज्ञान अर्जित करेगा,
नई-नई टेक्नीक सीखेगा, गांव का उद्धार करेगा।
दिन-रात करके मेहनत बेटे को पढ़ाया था,
जिस दिन बन गया था अफसर, सीना गर्व से मैंने फुलाया था।

ना मालूम था अफसरी उसके सिर चढ़कर बोलेगी,
छोड़ देश की मिट्टी परदेश की ललक इसे अपनी ओर खींचेंगी,
कहा बेटा बन गए हो अफसर नेकी का काम करो,
कुछ अफसरों से बात- चीत करो, अपने गांवका उद्धार करो।
बोला नाक-मुंह सिकोड़ गांवकी धूल-मिट्टी ना मुझे भाती है,
मेरी बीवी परदेश की हवा सुहानी चाहती है,

आप भी यहां क्या करोगे, पहले हम जाएंगे, बस जल्दी ही आपको ही बुलवाएंगे,
बीते सालों-साल गए बेटे को परदेश, संदेश ना अब तक कोई आया है,
कहता है समय नहीं है, काम का बहुत सरमाया है,

वहां आपके पास आएंगे तो बच्चों की पढ़ाई का होगा हर्जा,
आपको भी नहीं बुला सकते पास अपने होता है बहुत खर्चा,

ले रहे हैं हम आज आखिरी सांसें, कोई अग्नि देने ना आएगा,
पढ़ें-लिखे परदेशी बेटे से तो अनपढ़ पड़ोसी भला जो दाग़ हमें लगाएगा।

प्रेम बजाज 
जगाधरी (यमुनानगर)
 
3 वर्ष पहले
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