आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

परदेश

                
                                                         
                            हुआ बेटा पैदा तो गांव भर में खुशियां मनाई गई,
                                                                 
                            
चश्मों-चिराग आया खानदान का खूब बधाईयां गाई गई,

ना जाने कितने बड़े-बड़े सपने देख डाले थे,
ना पढ़ पाया खुद तो क्या बेटे को खूब पढ़ाऊंगा,
दुनियां करें सलाम ऐसा बड़ा अफसर बनाऊंगा।

पढ़-लिखकर बेटा ज्ञान अर्जित करेगा,
नई-नई टेक्नीक सीखेगा, गांव का उद्धार करेगा।
दिन-रात करके मेहनत बेटे को पढ़ाया था,
जिस दिन बन गया था अफसर, सीना गर्व से मैंने फुलाया था।

ना मालूम था अफसरी उसके सिर चढ़कर बोलेगी,
छोड़ देश की मिट्टी परदेश की ललक इसे अपनी ओर खींचेंगी,
कहा बेटा बन गए हो अफसर नेकी का काम करो,
कुछ अफसरों से बात- चीत करो, अपने गांवका उद्धार करो।
बोला नाक-मुंह सिकोड़ गांवकी धूल-मिट्टी ना मुझे भाती है,
मेरी बीवी परदेश की हवा सुहानी चाहती है,

आप भी यहां क्या करोगे, पहले हम जाएंगे, बस जल्दी ही आपको ही बुलवाएंगे,
बीते सालों-साल गए बेटे को परदेश, संदेश ना अब तक कोई आया है,
कहता है समय नहीं है, काम का बहुत सरमाया है,

वहां आपके पास आएंगे तो बच्चों की पढ़ाई का होगा हर्जा,
आपको भी नहीं बुला सकते पास अपने होता है बहुत खर्चा,

ले रहे हैं हम आज आखिरी सांसें, कोई अग्नि देने ना आएगा,
पढ़ें-लिखे परदेशी बेटे से तो अनपढ़ पड़ोसी भला जो दाग़ हमें लगाएगा।

प्रेम बजाज 
जगाधरी (यमुनानगर)
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर