कैसा समय आया है, कैसी विडम्बना लाया है,
कैसी कशमकश है, ईश्वर ने कैसा खेल रचाया है,
है एक तरफ अर्थी माँ की, एक तरफ सेहरा बेटे का सजाया है।
आज टूकड़े दो दिल के हुए, एक टुकड़ा खुशी की लहर
में दौड़ रहा तेज़ रफ़्तार से, एक टुकड़े में खून उतर आया है।
निभाते हुए फ़र्ज़ बेटी का, माँ का फ़र्ज़ भी तो निभाना है ।
कैसे समझाऊं दिल को जो चली गई, वो भी तो मेरी थी,
जो आने वाली है, वो मेरी बनने वाली है
कर के विदा एक नारी को एक नारी को लाना है,
जो गुज़र गया वो भी ज़माना था, जो आ रहा वो भी ज़माना है।
देकर बिदाई माँ को एक फ़र्ज़ निभाना है,
करना अभिनन्दन बहू का ये फ़र्ज़ भी तो हमारा है।
पी कर आँसू हमें मुस्कुराना है, पीछे जा नहीं सकते
आगे बढ़ते जाना है, भूलकर ग़म अपना सबके होंठों
पर हँसी को लाना है।
प्रेम बजाज
जगाधरी ( यमुनानगर)
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