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एक झलक ज़िंदगी

prem bajaj

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक झलक ज़िंदगी को देखा मैंने
        
                                                    
                            

कल एक झलक ज़िन्दगी को देखा मैनें
जैसे करते हुए उसे बंदगी मानो देखा मैंने।

पराए तो गिरा कर माफी मांग लेते हैं
दर्द देते अपने लोगों को देखा मैंने।

इन्सान को इन्सान ना समझें ऐसे उंचे
अंहकार में जीते अमीरों को देखा मैंने।

लोगों के सपने पल में हकीकत बन गए
उजड़ते खुद के सपनों को देखा मैंने।

ए इन्सां क्या लाया क्या ले जाएगा साथ
टूटते अंहकारियों के अंहकार को देखा मैंने।

भोला-भाला नहीं हूं चालाक हूं बड़ा
कहते - सुनते लोगों को देखा मैनें ।

कभी कोई नया मिला कर खुशियां देती
कभी किसी को तकलीफ देते जिन्दगी को देखा मैंने।

कभी बचपन की खिलखिलाती,कभी जवानी को महकाती,
कभी बुढ़ापे में जीवन को तरसाती जिंदगी को देखा मैंने।

शायर बहुत हैं मगर जो दर्द बयां कर
सके शायर वो *प्रेम * को देखा मैनें ।

मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज©®
जगाधरी ( यमुनानगर )
2 वर्ष पहले
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