एक झलक ज़िंदगी को देखा मैंने
कल एक झलक ज़िन्दगी को देखा मैनें
जैसे करते हुए उसे बंदगी मानो देखा मैंने।
पराए तो गिरा कर माफी मांग लेते हैं
दर्द देते अपने लोगों को देखा मैंने।
इन्सान को इन्सान ना समझें ऐसे उंचे
अंहकार में जीते अमीरों को देखा मैंने।
लोगों के सपने पल में हकीकत बन गए
उजड़ते खुद के सपनों को देखा मैंने।
ए इन्सां क्या लाया क्या ले जाएगा साथ
टूटते अंहकारियों के अंहकार को देखा मैंने।
भोला-भाला नहीं हूं चालाक हूं बड़ा
कहते - सुनते लोगों को देखा मैनें ।
कभी कोई नया मिला कर खुशियां देती
कभी किसी को तकलीफ देते जिन्दगी को देखा मैंने।
कभी बचपन की खिलखिलाती,कभी जवानी को महकाती,
कभी बुढ़ापे में जीवन को तरसाती जिंदगी को देखा मैंने।
शायर बहुत हैं मगर जो दर्द बयां कर
सके शायर वो *प्रेम * को देखा मैनें ।
मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज©®
जगाधरी ( यमुनानगर )
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