आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

एक झलक ज़िंदगी

                
                                                         
                            एक झलक ज़िंदगी को देखा मैंने
                                                                 
                            

कल एक झलक ज़िन्दगी को देखा मैनें
जैसे करते हुए उसे बंदगी मानो देखा मैंने।

पराए तो गिरा कर माफी मांग लेते हैं
दर्द देते अपने लोगों को देखा मैंने।

इन्सान को इन्सान ना समझें ऐसे उंचे
अंहकार में जीते अमीरों को देखा मैंने।

लोगों के सपने पल में हकीकत बन गए
उजड़ते खुद के सपनों को देखा मैंने।

ए इन्सां क्या लाया क्या ले जाएगा साथ
टूटते अंहकारियों के अंहकार को देखा मैंने।

भोला-भाला नहीं हूं चालाक हूं बड़ा
कहते - सुनते लोगों को देखा मैनें ।

कभी कोई नया मिला कर खुशियां देती
कभी किसी को तकलीफ देते जिन्दगी को देखा मैंने।

कभी बचपन की खिलखिलाती,कभी जवानी को महकाती,
कभी बुढ़ापे में जीवन को तरसाती जिंदगी को देखा मैंने।

शायर बहुत हैं मगर जो दर्द बयां कर
सके शायर वो *प्रेम * को देखा मैनें ।

मौलिक एवं स्वरचित
प्रेम बजाज©®
जगाधरी ( यमुनानगर )
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर