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अस्काम के शंखनाद से

Pravesh Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            डर रही है गंगा,
        
                                                    
                            
निर्वाक है हिमालय,
मचल रहा सागर,
अस्काम के शंखनाद से,

चीख रहा है आसमान,
बरसेंगे अब विस के बाण,
उगलेगी आंखें लाल अश्क,
अस्काम के शंखनाद से।

1....
उक्सा रहा कुदरत को तू,
जगा रहा नफरत को तू,
विपदा कोई छाने को है,
अंधियारा अब आने को है

धधक रही है ज्वाला,
भर गया है प्याला,
कांप उठी है धरती,
अस्काम के शंखनाद से।

2....
रोक दो अब ये कारवां,
हस रहा तुझ पर खुदा,
ना टिक सकेंगे तेरे पांव,
जब प्रकृति का होगा दाव,

बरगत की जन्म भूमि पर,
इमारतों का राज है,
पंछी भटक गये है राह,
अस्काम के शंखनाद से।

पूछ जरा ये खुद से तू किस दो राहे पे तू खड़ा है,
सोच जरा उसके बारे मे जिसने ये जीवन दिया है,
दोस है क्या उन पेड़ो का जिसका तूने लहू जलाया,
क्या हक है तेरा बेजुबां पर उनको भी तूने है सताया

डर रही है गंगा,
निर्वाक है हिमालय,
मचल रहा सागर,
अस्काम के शंखनाद से,

चीख रहा है आसमान,
बरसेंगे अब विस के बाण,
उगलेगी आंखें लाल अश्क,
अस्काम के शंखनाद से।


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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