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दौलत उसका ईमान डिगा नहीं सकती।

Praveen Roy

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            महफिलों को भी वीरान होते हमने देखा हैं
        
                                                    
                            
कबीलों को भी नाकाम होते हमने देखा है।
ये रंग बदलती दुनिया हैं साहब
अमीरों को भी सर छुपने झोंपड़ी में जाते देखा हैं।

कुछ तो कशिश होगी उसकी तन्हाई में
दिखावे में कभी ऐतबार ही न किया।
जनाजे की भीड़ भी समेट नहीं पाई
शोहरत इतनी गुमनामी में कमा गया।

हवाओं ने जरा सा रुख क्या बदला
पत्तों ने भी रंग बदलना शुरू कर दिया।
जो कल हमारी दोस्ती की फेरहिस्त में थे
आज नजरों से देखना भी मुनासिब न समझा।

समय का चक्र कुछ यूं बदला साहब
राजा को भी सिपाही मात दे गया।
ग़ैरों की बात क्या करें साहब
अपने ही ज़ख्म सारा दे गया।

काँटों पर जिसने चलना सीखा हो
फूलों की चाहत उसे गिरा नहीं सकती।
जिसने अभावों में भी खुश रहना सीखा है
दौलत उसका ईमान डिगा नहीं सकती।

जिसके लिए में ताउम्र भागता रहा
वो आज मुझे तलाशने आये थे।
वक़्त ने भी वक्त मुक़र्रर किया था
मेरे जनाजे की भीड़ में मेरा पता पूछने आए थे।

खामोशी से जवाब देने का तरीका मैंने भी ढूंढ लिया है
चेहरे का अंदाज पढ़ने का हुनर भी सीख लिया है।
अल्फाजों पर आजकल ऐतबार करना छोड़ दिया है
यूं समझिए खुद को खुद से जुदा करना सीख लिया है।

दूसरों की कश्तियाँ डुबोने का शौक बहुत था उन्हें
साहिल को कश्ति से अलग करने का तजुर्बा था उन्हें।एहसास तो तब हुआ जब खुद की कश्ति तूफानों से उलझा
साहिल भी अपना रास्ता खुद बदल लिया।
4 घंटे पहले
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