करता था इबादत कभी दिन रात उसकी मै
अब जाने क्या है सजदे में सर क्यूँ नहीं जाता
जो लाख कोशिशों पे काम मुझसे न हुए
आकर के ऐसे काम को कर क्यूँ नहीं जाता
सदियों से ख़्वाब घुट रहा हैं आंख में मेरी,
पूरा नहीं होना है तो मर क्यूँ नहीं आता
बिछड़े हुए तो मुझको जमाना हुआ है दोस्त
फिर उसकी मोहब्बत का असर क्यों नहीं जाता
किस बात पर तू अपने लोगों से खफा है
बस इतना बता दे कि तू घर क्यों नहीं जाता
अल्लाह जाने किसकी नजर लग गई मुझको
मंजिल की तरफ मेरा सफर क्यों नहीं जाता
लगता है वो यहीं है, के जो है नहीं यहां
मन से मेरे उसका ये भरम, क्यूँ नहीं जाता ।