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न्याय और जीवन के अर्थ की तलाश

Pratiksha Shukla

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी-कभी
        
                                                    
                            

कभी-कभी मन होता है
कहीं शांति और सुकून की दुनिया खोजूँ,
जहाँ हर सवाल का जवाब हो,
या कम-से-कम
सवाल पूछने की सज़ा न हो।
कभी-कभी सोचती हूँ—
क्या सच में भगवान हैं?
अगर हैं, तो फिर
इंसान की परीक्षा इतनी लंबी क्यों है?
और अगर नहीं हैं,
तो फिर हर मुश्किल में
उन्हें याद करने की आदत क्यों है?
कभी-कभी लगता है,
शायद इंसान ही इंसान का सहारा है—
जो पास है, वही अपना है,
बाकी तो दुनिया
ज़रूरत के हिसाब से पहचानती है।
कहीं किसी घर में जन्म पर
खुशियाँ बाँटी जाती हैं,
तो कहीं मृत्यु पर
चुप्पियाँ बाँटी जाती हैं।
कहीं विश्वास इतना है
कि आँखें बंद करके भी रास्ता मिल जाता है,
तो कहीं सवाल इतने हैं
कि आँखें खुली हों,
फिर भी रास्ता दिखाई नहीं देता।
किसी के हिस्से में सुख है,
किसी के हिस्से में दुःख—
और हम इसे भी
किस्मत का नाम देकर
कितनी आसानी से आगे बढ़ जाते हैं।
कभी-कभी सोचती हूँ—
आख़िर कैसी व्यवस्था है यह,
जहाँ हर किसी को
उसके हिस्से का जीवन तो मिलता है,
पर उसके हिस्से का न्याय
कहाँ मिलता है?
शायद यही दुनिया है—
किसी के लिए भगवान की कृपा,
किसी के लिए भगवान की परीक्षा,
और किसी के लिए
भगवान पर ही सवाल।
फिर भी इंसान जीता है,
उम्मीद करता है,
और हर सुबह
एक नई शुरुआत का भ्रम पालता है।
शायद यही जीवन का सबसे बड़ा व्यंग्य है—
हम जवाब खोजते रहते हैं,
और जीवन
हर बार एक नया सवाल दे जाता है।
2 दिन पहले
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