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तितली और फूल

Prashant Rajpoot

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सज-धज कर मुस्का रहा था, डाली पर एक फूल,
        
                                                    
                            
तितली आई पास उसके, अपनी सुध-बुध भूल।
चूम रही थी पंखुड़ियों को, गाती मीठा गान,
पहला फूल समझ बैठा था, वही उसकी जान।

तभी अचानक पास में ही, एक और फूल खिल गया,
नया रंग और नई महक का, तितली को दिल मिल गया।
छोड़ पुराना साथ वो पल में, नए फूल पर जा बैठी,
भूल गई वो सारे वादे, ज़रा न हिचकी, न ऐंठी।

देख कर ये मंज़र सारा, पहला फूल उदास हुआ,
सच्ची चाहत का उसको, कैसा ये अहसास हुआ।
आँसू बनकर ओस गिर रही, बिखरा उसका नूर,
जिसको चाहा दिल से उसने, वो हो गई दूर।तीसरे फूल का इंतजार:

वहीं पास में सहमा-सहमा, एक तीसरा फूल खिला था,
तितली आए पास उसके भी, बस यही एक सपना बुना था।
आई तितली उड़ती-उड़ती, देख उसे वो हर्षाया,
लगा कि उसकी किस्मत जागी, मन में एक भरोसा आया।

पर हाय रे किस्मत! वो तितली, बस छूकर ही निकल गई,
बिना बैठे उस तीसरे पर, आगे की राह पकड़ गई।
न चुराया रस, न की बातें, बस देकर एक झूठी आस गई,
प्यासा छोड़ उस मासूम को, वो किसी और के पास गई।

तितली के इस रूखेपन से, तीसरा फूल टूट सा गया,
खिलने से पहले ही मानो, उसका सब कुछ लूट सा गया।
पंखुड़ियाँ उसकी सिमट गईं, वो बेचारा मुरझाया है,
रंग उड़ गया चेहरे का उसके, गम का साया छाया है।

पर मुरझाकर भी डाली पर, वो अब भी आस लगाए है,
तितली की उस एक छुअन को, दिल में कहीं छुपाए है।
सोच रहा है आएगी वो, फिर से उसे हँसाने को,
छोड़ के सारे बाग-बगीचे,उसका रूप सजाने को।

तरस रही हैं आँखें उसकी, कब वो मौसम आएगा,
जब तितली के वापस आने से, वो फिर से खिल जाएगा।

अंत:-१
(इस अंत में तितली को अपनी गलती का अहसास होता है और वह तीसरे फूल के पास लौट आती है)

उड़ते-उड़ते थक गई तितली, मिला न मन को चैन,
याद आया वो तीसरा फूल, और उसकी प्यासी नैन।
चमक-दमक सब झूठी निकली, नए फूल थे बेगाने,
लौट चली वो वापस अपने, सच्चे मीत को पाने।

जैसे ही वो छूकर बैठी, मुरझाए उस फूल को,
माफ किया उस सच्चे दिल ने, तितली की हर भूल को।
खिल उठी पंखुड़ियाँ फिर से, महक उठा उपवन सारा,
सच्चे सब्र की जीत हुई, और लौट आया सुख का धारा।

अंत:-२
(इस अंत में फूल तितली की आस छोड़ देता है और एक भँवर आता है जो उसकी कद्र करता है)

बीत गए दिन, थमा न रोना, तितली लौट न आई,
तभी अचानक उस डाली पर, एक गूंज सी छाई।
काला-भँवरा उड़ता आया, रूप-रंग से था जो सादा,
पर मुरझाए फूल का दुख देख, उसने निभाया वादा।

वो बैठा आकर हौसले से, उसकी बिखरी पंखुड़ियों पर,
प्यार लुटाया उसने अपना, उस टूटे हुए दिल पर।
भँवरे का ये निश्छल चाहत, फूल को नया जीवन दे गया,
भूल गया वो तितली के गम को, खुशियों से मन भर गया।
जो कद्र करे बस वही है अपना, ये पाठ वो सीख गया।

 
एक घंटा पहले
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