छनन-छनन छुम सुनते ही
दिल खुश हो जाता है।
देख सुखद भविष्य के सपने
मन कहीं खो जाता है।
सोन चिरईं सा घर-आँगन बीच
ठुमक-मटक जब चलती हैं--
खूब इठलाती बेटियाँ !
किया शरारत भाई ने जब
ऐंठी, मुँह बिचकाई बैठी।
दौड़ाकर फिर उसको पकड़ा,
गरम-गरम दी कान-कनैठी।
पर अगले पल खेल-खेल में,
रूठे भाई-बहनों के संग,
लाड़ लड़ाती बेटियाँ !
रूढियों-बेड़ियों को तोड़ा है
धैर्य-हिम्मत का लिए सहारा।
देख निडरता इनकी काँपे
डर के मारे यह जग सारा।
आजादी का जश्न मनाती
चीर रहीं अब अंतरिक्ष को,
पंख फैलाती बेटियाँ !
कोई जमा पूँजी लूटे जस
कर जाती हैं पीहर सूना।
साथ निभा जीवन साथी का
कर देती हैं शान दोगुना।
जाने क्या-क्या सह जाती हैं
मान बढ़ाकर दो कुलों की,
रीत निभाती बेटियाँ !
माथा टेका, मन्नत मांगी,
मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर में।
धन अमोल बेटी के जैसा
कहाँ मिला पर सबके घर में?
ईश कृपा या पुण्य कमाई,
खुश किस्मत वह जिसने पाईं--
मकुस्कुराती बेटियाँ !
- प्रमोद कुमार,
गढ़वा (झारखण्ड)