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तराज़ू

Pradeepti Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी ये पलड़ा भारी
        
                                                    
                            
कभी वो पलड़ा हल्का
तराज़ू सी ये ज़िन्दगी
वज़न इस पर कितने सारे
पाव भर की ख़्वाहिशें
ज़िम्मेदारियाँ किलो भर की
रत्ती रत्ती मिलना मुश्किल
खोने को हिस्से हज़ार
कभी ये मसला
कभी वो वजह
आधा आधा कहाँ होता कुछ
पलड़ा हमेशा एक भारी
तो एक रहता हल्का

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।

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5 वर्ष पहले
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