कभी ये पलड़ा भारी
कभी वो पलड़ा हल्का
तराज़ू सी ये ज़िन्दगी
वज़न इस पर कितने सारे
पाव भर की ख़्वाहिशें
ज़िम्मेदारियाँ किलो भर की
रत्ती रत्ती मिलना मुश्किल
खोने को हिस्से हज़ार
कभी ये मसला
कभी वो वजह
आधा आधा कहाँ होता कुछ
पलड़ा हमेशा एक भारी
तो एक रहता हल्का
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