इंसानियत से बढ़कर
है नहीं कोई धर्म
या मज़हब
फिर भी न जाने क्यों
धर्म या महज़ब का लेकर
बहाना
या धर्म का नाम लेकर
हैं फैलते
इतना वैमनस्य
इतनी नफरत
समाज में
कुछ सिरफिरे
बनाया है धर्म को
इंसान ने ही
इसलिए हो नहीं सकता धर्म
इंसानियत से बड़ा
लेकिन धर्म के ठेकेदार
रौंद कर इंसानियत को
पैरों तले अपने
मजबूर कर देते
सिसकने को उसे
ऐसे में दोष दें भला
हम किसे?