अनुपम एहसास, दस्तक शरद की,
मन में जगी आस, आहट शरद की।।
खुला आसमान, चाँदनी का आँचल,
झील-सरोवर-ताल-नदी नीर निर्मल,
मंद-मंद बयार कहती कोई बात—
जैसे हो कोई मौन संदेश, आहट शरद की।।
शबनम की बूँदें लेकर आईं प्रेम-पैगाम,
शशि की शीतलता से शीतल हुई सुखद शाम,
श्वेत चादर-सी कास-कुसुम की कतार,
लिखती प्रेम-पत्र, आहट शरद की।।
गगन-पटल से पावस-घटाएँ हुईं विदा,
मन की उदासी भी आँखों से हुई जुदा,
प्रतीक्षा की सूनी राहों ने पूछा—
कब होगी मुलाकात, आहट शरद की।।
गुलाबी रात में जब महके रातरानी,
मन में उतर आए कोई धुन अनजानी,
अपनी ही धुन में मस्त गुनगुनाती चाँदनी—
कहती है फिर कोई बात, आहट शरद की।।
जब भी सताने लगें बार-बार यादें पुरानी,
जब इश्क का नशा हो जाए कुछ-कुछ जाफ़रानी,
किसी की दूरियाँ भी जब पास लगने लगें—
इतना गहरा नाता, आहट शरद की।।
जब मन ही मन मन फिर से सँवरने लगे,
जब बिखरे हुए सपने फिर से निखरने लगे,
प्रेम-ऋतु में बस इतनी-सी तमन्ना रहे—
कोई बन जाए प्यास, आहट शरद की।।
मरुभूमि-से मन में जब प्रेम-मेघ घिर आएँ,
सूखे अधरों पर मधुर मिलन-गीत उतर आएँ,
जब शरद भी पूर्णिमा बन अमृत बरसाए—
बन जाए जीवन की साँस, आहट शरद की।।
अनुपम एहसास, दस्तक शरद की,
मन में जगी आस, आहट शरद की।।
-प्रदीप सोनसर्व