विज्ञापन

आपातकाल में देश को संभाला था।

Pradeep Kairana

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हुई घर में लड़की,
        
                                                    
                            
तो छाई घर में अनबनी,

लोग पूछते हैं, “क्या हुआ?”
तो कहते हैं, “यार, कोई बात न बनी।”

क्योंकि लड़के की चाहत थी सबको,
अब घर उनके बिटिया आई है,

बधाई के चलते घर में,
हर किसी के मुख पर उदासी छाई है।

उन्हें नहीं पता, लड़कियों ने
इस धरा को जीता है,

हर उम्र में बिटियों ने
क्या-क्या सहना सीखा है।

बेटों की चाहत करने वालों,
तुम वंश कैसे चलाओगे?

जब चाहत नहीं,बेटियों की
तो बहू कहाँ से लाओगे?

समाज के बंधनों में रहकर,
सब कुछ वो सह रही है,

ससुराल की पीड़ित बातों को भी,
मायके में न कह रही है।

बचपन की बात करें तो,
बचपन में वो खेल रही,

उसी बचपन से देखो,
वो मासिक चक्र कि पीड़ा झेल रही।

जन्म निवास स्थान से आकर उसने,
तुम्हारा घर सजाया है

तुम्हारे वंश की खातिर उसने,
नौ महीने कष्ट उठाया है।

हर तरफ आज उन्होंने देखो,
कैसा झंडा गाड़ा है,

बेटों की चाहत रखने वालों,
आज उन बेटों को पछाड़ा है।

अपने देश की शान की खातिर,
वो चोटियों पर चढ़ रही हैं,

देखो उन्हीं बेटियों को आज,
वो आसमान में उड़ रही हैं।

उस समय की बात है,
जब खाने को न निवाला था,

वही बिटिया इंदिरा ने
आपातकाल में देश को संभाला था।

तुम कहते हो जीवन आसान है उनका,
तो झाँक कर तुम उन्हें देख लो,

अगर फिर भी न हो तसल्ली,
तो एक दिन उनका जीवन जीकर देख लो।
2 दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7573 कविताएं

View Profile