क्या बात होती, अगर जज़्बात साथ होते
क्या बात होती,
अगर जज़्बात साथ होते,
हम ख़ामोश भी रहते
तो शायद कुछ संवाद होते।
कुछ बातें थीं
जो होंठों तक आकर रुक गईं,
कुछ रिश्ते थे
जो वक़्त की दहलीज़ पर छूट गए।
तुमने भी शायद कुछ महसूस किया था,
हमने भी बहुत कुछ कहना चाहा था,
मगर दोनों के बीच
एक अजीब-सी ख़ामोशी थी—
जिसे कोई तोड़ न सका।
काश, उस दिन
हम अपने डर से आगे निकल जाते,
तुम एक कदम बढ़ाते,
हम एक कदम बढ़ाते,
तो शायद रास्ते अलग न होते।
कुछ लोग बिछड़कर भी
दिल से कहाँ जाते हैं,
वे यादों में नहीं,
हमारी ख़ामोशियों में बस जाते हैं।
आज भी कभी
अतीत का कोई पन्ना खुलता है,
तो लगता है—
कहानी ख़त्म नहीं हुई थी,
बस उसे कहने वाले
चुप हो गए थे।
न कोई शिकायत है,
न कोई इल्ज़ाम बाकी,
बस एक सवाल है
जो उम्र के साथ भी नहीं बदला—
अगर उस वक़्त
हम अपने जज़्बात कह पाते,
तो क्या हमारी कहानी
कुछ और होती?
शायद तुम मेरे पास होते,
शायद मैं तुम्हारे पास होता,
शायद हम दोनों के बीच
वो ख़ामोशी न होती—
और सच कहूँ,
तो ज़िंदगी में इससे बड़ी
कोई “क्या बात होती” नहीं होती…
अगर जज़्बात साथ होते।