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उलझनों के बीच

prabhakar sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उलझनों के बीच खड़ा हूँ,
        
                                                    
                            
खुद से ही कुछ कह रहा हूँ,
रास्ते तो बहुत हैं सामने,
फिर भी मंज़िल ढूँढ़ रहा हूँ।

कभी अपनों की उम्मीदें हैं,
कभी सपनों का सवाल है,
चेहरे पर मुस्कान सजी है,
दिल में कितना बवाल है।

कुछ बातें दिल में दबी हुई हैं,
कुछ रिश्ते खामोश पड़े हैं,
जिनको अपना समझा था हमने,
वही आज कुछ दूर खड़े हैं।

वक़्त ने हर मोड़ पर आकर,
एक नया सबक सिखाया है,
जिस दर्द को छुपाया सबसे,
उसने ही मुझे बनाया है।

अब न शिकायत है किसी से,
न किसी से कोई गिला है,
ज़िंदगी की इस भीड़ में भी,
खुद से मिलना ही बचा है।

उलझनें हैं, तो रहने दो,
कुछ सवाल अधूरे रहने दो,
हर बात का जवाब ज़रूरी नहीं,
कुछ एहसासों को बहने दो।

मैं टूटकर भी जुड़ जाऊँगा,
गिरकर फिर से उठ जाऊँगा,
ये दौर भी गुज़र ही जाएगा,
मैं खुद को फिर से पाऊँगा।

उलझनों के बीच इतना तो सीखा है,
हर अँधेरे में उजाला होता है,
जो खुद पर भरोसा रखता है,
उसके लिए हर मुश्किल के बाद एक नया सवेरा होता है।
एक घंटा पहले
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