गुनगुनी सी धूप थी शायद सूरज पिघला था
हल्की बौछारों सा छिटका सुनहरा यंहा वंहा
सर्दी ने चादर को धीमे धीमे उतार रखा था
कंही कोने में सिमट रही थी शीत की चुभन
सोने की परतों सा धूप ने उसे ढांक रखा था
गुनगुनी सी धूप थी शायद सूरज पिघला था
पेड़ो की डाल भर आईं कुछ पीले फूलों से
कंही बौर कंही कोंपले निकल आई शाखों पर
फिर से गूंजे उठे बोल चहचहाने से परिंदों के
ज़िन्दगी का फिर से सजा नया कोई ख्वाब था
गुनगुनी सी धूप थी शायद सूरज पिघला था
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