कोई यात्री जब लौटता है अपने मूल की ओर,
तो कभी कोई नहीं लौटता जस का तस।
कुछ न कुछ छूट ही जाता है पीछे,
जैसे कोई बेहद ज़रूरी सामान...
अंततः विवशताओं के सिर फोड़ दिए जाते हैं ठीकरे,
लौटने वाले भी, कभी पूरे नहीं लौटे!
जैसे निरंजना तट से कभी नहीं लौटे सिद्धार्थ,
और कपिलवस्तु की ओर, कभी नहीं लौटी बुद्ध की देह।
लंका से लौटकर भी,
सीता कभी नहीं लौटीं अयोध्या के राजमहल।
कलिंग युद्ध से लौटी तो बस एक क्लांत सेना,
चंडाशोक तो कलिंग के मैदानों में ही हमेशा के लिए छूट गया।
दुनिया फतह करने निकला सिकंदर,
कभी नहीं लौट सका मैसिडोनिया...
और कुरुक्षेत्र के महायुद्ध के बाद,
हस्तिनापुर के राजसिंहासन पर बैठकर भी,
पांडव कभी नहीं लौट सके अपने 'घर'।
ट्रॉय से बीस साल बाद इथाका लौटा ओडीसियस,
अपने ही घर में एक अजनबी था...
ठीक अंतरिक्ष के उस अथाह शून्य से लौटते,
उन यात्रियों की तरह!
जैसे मोहम्मद का मेराज से लौटना हो,
या सलीब के घावों के साथ ईसा का पुनर्जीवित होना...
एक लंबी यात्रा के बाद,
लौटना तो चाहते हैं यात्री,
पर वे फिर कभी, लौट नहीं पाते!